Wednesday 4 June 2008

हमारी पहचान?

क्या सिर्फ़ शहर ही हमारी पहचान है? मुम्बई, दिल्ली, बंगलौर आदि महानगर ही हमारी पहचान है ? गांव हमारे नहीं हैं? क्यों एक मुम्बई में रहने वाला इंसान भारत के सभी शहरों को गाँव कहता है और उसे पिछडा हुआ मानता है? इन सब सवालों के जवाब मुझे आज तक नहीं मिले?


आज लोगों को क्या हो गया है। वे अपनी जड़ों से इतना दूर क्यों होते जा रहे है। आज इंसान यह भूल जाता है की कहीं न कहीं वह भी भारत के किसी गाँव से जुड़ा ही होता है। भले ही आज वह शहरों में रह रहा हो लेकिन पिछली पीढ़ियाँ तो गाँवों में ही रही होंगी। क्यों आज इंसान अपने गाँव, अपनी जन्मभूमि , अपनी पहचान से कतरा रहा है, उसे हीन दृष्टि से देख रहा है। आज हम ख़ुद को गाँव का बताने में भी बहुत लज्जित महसूस करते हैं। हमें लगता है की कहीं सामने वाला व्यक्ति हमें बेवकूफ न समझ ले। पर इन सब बातों के बारे में सोचते हुए हम यह भूल जाते हैं की हमारी असली पहचान, हमारी धरोहर, हमारी संस्कृति, भारत की पहचान हमारे गाँव है। अतः वे न केवल सम्मानजनक स्थल है अपितु हमारे जीवन का एक अभूतपूर्व अंग हैं।


कौन कहता है हमारे गाँव पिछडे हुए हैं! जब दुनिया न्याय का मतलब भी नहीं जानती थी तब हमारे गाँवों में पंचायत हुआ करती थी। जब स्कूल नहीं हुआ करते थे तब दादा, नाना गाँव के चबूतरे पर बैठकर अपने पोते- पोतियों को देश- विदेश की कहानियाँ सुनाया करते थे। इतना ही नहीं दुनिया में हर सफलता की कुंजी ' एकता' का पाठ भी हमारे गाँवों में नायाब तरीके से पढाया जाता था। जब गाँव भर के लोग एक साथ मिलकर दूरदर्शन देखते थे तब वे दूरदर्शन का आन्नद तो लेते ही थे साथ ही एक- दुसरे के साथ का भी अन्नंद लेते थे। गाँव की पाठशाला में जो सीख बच्चों को दी जाती थी, वो शिक्षा भी आज का कोई स्कूल या विद्यालय अपने बच्चों को नही दे सकता। जो प्रेम, सौहाद्र, सुख, शान्ति का पाठ उन स्कूलों में पढ़ाया जाता था, वो बात आज के स्कूलों में कहां है! हर धर्म, हर व्यक्ति के प्रति सम्मान, मुसीबत में एक दुसरे का साथ देने की तत्परता आज कहां देखने को मिलती है। कम से कम इन शहरों में तो देखने को नहीं मिलती है। इन सब बातों को देखकर भी अगर हम यह सोचते और कहते हैं की हमारे गाँव पिछडे हुए हैं तो शायद मेरे नज़रिये में हमारी सोच पिछड़ी हुई है।


हाँ ये ठीक है की अब वक्त बदल गया, टेक्नोलॉजी ने भी प्रगति की है परन्तु इसका मतलब यह नहीं की हम आज में जीने के लिए कल को भुला दें; अपनी धरोहर, अपनी संस्कृति को भुला दें। कल तक हमे जिस गाँव की ज़रूरत थी, आज उसी गाँव को हमारी ज़रूरत है। अगर हम उस गाँव की ज़रूरत नहीं पूरी कर सकते तो कम से कम उसका अपमान न करे और न ही उसे हीन दृष्टि से देखें।