Saturday, 29 November, 2008

एक जंग- आतंकवाद के संग

मैं एक मुम्बईकर हूँ। शायद ये बात ही मेरे दिल के दर्द को बयां कर दे। पर नहीं मुझे आज दिल का दर्द नहीं बयां करना। आज मुझे एक हकीक़त को लिखना है।

जो मुंबई शहर सोता नहीं था, आज वहाँ शाम के सात बजे भी मरघट जैसा सन्नाटा था। शायद हर दिल में एक भय था, एक डर था। जो शहर आज तक नहीं थमा था, वो आज थम गया था। जिसकी वजह थी- आतंकवाद।

आतंकवाद बहुत बड़ा शब्द है। जिसे मैंने किताबों में पढ़ा, जिस शब्द को बड़ी सहजता से मैंने अपनी कविताओं में, लेखों में लिखा था, जिसे मैंने टीवी पर जयपुर, दिल्ली, बंगलोर, अहमदाबाद में ब्लास्ट के दौरान देखा था, जिसे मैंने बुरा तो माना था लेकिन जिसे मैंने एक आम, रोज़मर्रा की बात मानकर भुला दिया था, जिस शब्द को मैंने दुनिया में एक आम नज़ारा मानकर, भारत की किस्मत मानकर भुला दिया था। लेकिन आज जब अपने घर को जलते देखा, अपने शहर को छटपटाते हुए देखा, अपने घर के कुछ दूर पर लोगो को मरते हुए देखा तो अहसास हुआ ये आतंकवाद शब्द का मतलब क्या है, इस छोटे शब्द के परिणाम क्या है, जलते जयपुर, दिल्ली, बंगलोर, अहमदाबाद का दर्द क्या है, अफगानिस्तान, इरान के हालात क्या है, डब्लू.टी.ओ. की कहानी क्या है।

शायद आज अहसास हुआ की मरने का भय क्या होता है, हर आती- जाती साँस पर खुद का पहरा नहीं किसी और की बंदिश कैसी होती है, रात को आँख बंद करने से पहले ये सोचना कि ' कल हो ना हो' कैसा होता है, थोड़ी सी आहट पर डरना क्या होता है, ख़ौफ़ के साए में जीना कैसा होता है। शायद ताज के हर जलते कोने में मेरी जीवन की उमंग कहीं खो गई है।

आज आसमान की खामोशी भी दिल को दहला रही थी, रात का अन्धेरा सुबह के उजालों पर हावी हो रहा था, आकाश में हर उड़ता परिंदा शायद मेरे दर्द को महसूस कर रहा था और बिना शोर किए बस अनमने मन से निरंतर उड़ रहा था।

यकीन नहीं होता कि जिस ताज में कुछ दिनों पहले मैने अपना वक्त गुज़ारा था, जहाँ जाकर मैंने खुद को बहुत खुश पाया था, आज वही जगह मेरे लिए बस एक टूटी हुई दहशत से भरी इमारत थी। शायद वक्त बदल गया है या यों कहें की गोलियों की आवाज़ ने, बॉम्ब ब्लास्ट की आवाज़ ने, मरघट से सन्नाटे ने, चलते-फिरते शहर में सेना की छावनी ने सब कुछ बदल दिया।

इन सब के बीच सिर्फ़ एक बात ने मेरा हौसला बनाए रखा और जीने की तमन्ना को बनाए रखा, वो थे हमारे आर्मी, एन. एस. जी., ए. टी. एस, नेवी, एयरफोर्से के जाँबाज़ जिन्होंने अपने देश की रक्षा के लिए, हमारे जैसे लोगों की साँसे चलती रहे इसलिए खुद की जान गवाँ दी।

जो कुछ हुआ आम आदमी को हुआ, इन नेताओं का कुछ नहीं बिगड़ा। इन लोगों ने तो इस परिस्थिति का इस्तेमाल भी अपने वोट- बैंक बढ़ाने में कर लिया। कहाँ गये वो मुंबई का नारे लगाने वाले नेता जो आज अपने घर में दुबके हुए हैं। उन्हें कुछ नहीं होगा, बस हमारे ये जाँबांज़ नौजवान और आम लोग ही मरेंगे। खैर ये वक्त किसी पर इल्ज़ाम लगाने का नहीं है। क्योंकि हम भी कुछ कम ग़लत नहीं है, क्योंकि हमें हर चीज़ की आदत बड़ी जल्दी हो जाती है, कुछ दिनों में इस हादसे के साथ जीने की भी हमें आदत हो जाएगी। पता नहीं कब हमें कुछ बदलने की आदत कब होगी।

लेकिन चाहे जो हो, हमारे देश के सिपाही तो हमारे अपने हैं। ये सोच कर भी मन भर उठता है, दिल रो उठता है कि कुछ लोगों ने इसलिए अपनी आँखे बंद कर ली ताकि हमारी साँसे चलती रहें। आज पहली बार इन आँखों से अश्रु बहे उन लोगों के लिए जो भले ही मेरे पहचान के ना हो लेकिन जिनका दर्जा मेरे जीवन में बहुत ऊँचा है। ऐसे इन जाँबाज़ों को मेरा शत- शत नमन।

इस घटना ने मुझे पूरी तरह से बदल दिया है। मेरी सोच को झकझोर दिया है। एक आम, मदमस्त रहने वाली इस लड़की को, उसके निश्छल, चंचल मन को गहरी सोच में डाल दिया है। मुझे उम्र भर शायद मुंबई के बारे में कुछ याद रहे ना रहे लेकिन ये घटना मेरे हृदय पटल पर मरते दम तक एक बुरी याद के रूप में अंकित रहेगी। जिसे चाह कर भी मैं मिटा नहीं पाऊँगी।

शायद इन तीन दिनों के बाद मेरी ज़िंदगी के प्रति सोच वैसी के वैसी ना रहे और बदल जाए, पर एक बात तो ज़रूर रहेगी की ज़िंदगी इतनी आसान नहीं है, हर पल एक जंग है और इस बार ये जंग थी आतंकवाद के साथ, कल शायद ये जंग ख़त्म हो आतंकवाद को मिटाने के साथ।