Wednesday, 18 August 2010

ये कैसा मौत का तमाशा है

ये कैसा मौत का तमाशा है
पागलपन में डूबा जग सारा है
ढोंग करता मनु, हर हथियारा है
ये कैसा मौत का तमाशा है।
किसी की मौत यहाँ सुनहरा मौका है
अपना मतलब सिद्ध करने का पुलिया है
गुस्से को जाहिर करने का गलियारा है
ये कैसा मौत का तमाशा है।
ये कैसी खोखली श्रधांजलि है
आँखें है नम पर मन में मतलब की आग है
मौत के नाम पर खोखला अधिकार जगा है
ये कैसा मौत का तमाशा है।
मिडिया की होड़ में सच लगा है
दंगे में उसकी मौत का बदला छुपा है
कहो तो, सच्चाई के लिए, ये झगडा है
ये कैसा मौत का तमाशा है।
दुनिया का कैसा ये मृत्यु महोत्सव है
सच्चाई के नाम पर ढोंग का तांडव है
पागलपन में डूबा जग सारा है
ये कैसा मौत का तमाशा है।

Saturday, 14 August 2010

ये कैसा दुहरापन है ज़िन्दगी तेरा, दोगलेपन में डूबा है हर इंसान तेरा

ऊब गया है अब मन मेरा

रो उठा है हर मंज़र मेरा

कांप रहा है हर सच मेरा

ये कैसा दुहरापन है ज़िन्दगी तेरा,

दोगलेपन में डूबा है हर इन्सान तेरा।

राम की माला में रावण का मोती सिया

मंदिर की दीवारों को खून से रंगा गया

रहीम की अहिंसा में हिंसा को खोज लिया

निर्बल को कुचलने में सुकून हासिल कर लिया

ये कैसा दुहरापन है ज़िन्दगी तेरा,

दोगलेपन में डूबा है हर इंसान तेरा।

मन में देवता, आचरण में राक्षस, हर मनु यहाँ

धर्म का नगाड़ा पीटता हर ढोंगी यहाँ

खोखले सिधान्तों को रटता हर कमज़ोर यहाँ

वसुधैव- कुटुम्बकम को छेदता हर जात- पात यहाँ

ये कैसा दुहरापन है ज़िन्दगी तेरा,

दोगलेपन में डूबा है हर इंसान तेरा।

अपने ही खून को जूठे मान में बहा दिया

आज़ादी की नासमझी में बेटी को जल्दी ब्याह दिया

आवाज़ उठाने पर औरत को कुलक्षनी बना दिया

बेटे की अय्याशियों पर नादानी का पर्दा डाल दिया

ये कैसा दुहरापन है ज़िन्दगी तेरा,

दोगलेपन में डूबा है हर इंसान तेरा।

इज्ज़त की चादर में अपनों की इच्छाओं को ढक दिया

समाज के साए में कई अरमानों को जला दिया

संस्कारों की नाव में कई इंसानों को डुबो दिया

सच्चाई के डर से अपना ईमान बेच दिया

ये कैसा दुहरापन है ज़िन्दगी तेरा,

दोगलेपन में डूबा है हर इंसान तेरा।

चीख रहा है अब मन मेरा

व्याकुल है हर क्षण मेरा

मेरी आवाज़ दबाने को आतुर है जग तेरा

ये कैसा दुहरापन है ज़िन्दगी तेरा,

दोगलेपन में डूबा है हर इंसान तेरा।

Friday, 13 August 2010

मैं कौन हूँ? मेरी पहचान क्या है?

कटी पतंग सा मेरा हर फ़साना क्यों है?
अधमरे सपनों का यहाँ बसेरा क्यों है?
हर दिशा में पसरा वीराना क्यों है?
बिखरा मेरी ज़िन्दगी का हर पल क्यों है?
मैं कौन हूँ? मेरी पहचान क्या है?
दो पाटों के बीच ज़िन्दगी उलझी क्यों है?
अपनों के बीच ये दरारें क्यों है?
हमसफ़र और सहचर की ये दुविधा क्यों है?
निराशा के समंदर में गुम हौसला कहाँ है?
मैं कौन हूँ? मेरी पहचान क्या है?
खुद को ढूढने की कोशिश अधूरी क्यों है?
खुद को कम आंकने की आदत क्यों हैं?
शब्दों की दुनिया में ये खालीपन क्यों है?
सोच की गहराई में ये खोखले सिद्धांत क्यों है?
मैं कौन हूँ? मेरी पहचान क्या है?
मेरे सवालों का जवाब क्या है?
इस अंतर्द्वंद्व का अंत क्या है?
इस कलम की सोच क्या है?
इस अवनि की मंजिल क्या है?
मैं कौन हूँ? मेरी पहचान क्या है?

Wednesday, 28 April 2010

कह दो किनारों से, हमें बह जाना है

कह दो किनारों से, हमें बह जाना है
रोके न हमें, हमें कुछ पाना है
तो क्या हुआ मंजिल ज़रा दूर है
अकेली नाव में एक ही पतवार है
कह दो उन उफानी लहरों से कोई
साहस ही हमारा तराना है
कह दो किनारों से, हमें बह जाना है।
है क्या किसी में इतना दम
रोक ले जो हमारे कदम
डाल दे रोड़े राहों में कोई हज़ार
झुकेगा न एक पल भी इस नाव का कहार
कर दो आगाह उन समुद्री दरिंदो को कोई
आत्मविश्वास से ही ये जग हारा है
कह दो किनारों से, हमें बह जाना है।

चाहे रोक ले इस ज़िन्दगी की सांस कोई
रोक पायेगा न इस सोच की रफ़्तार कोई
कैद कर ले मेरा हर पल कोई
न छु सकेगा मेरे स्वाभिमान को कोई
कह दो उन भयानक समुद्री राहों से कोई
इस कलम को बैखौफ बहते जाना है
कह दो किनारों से, हमें बह जाना है।

ढूंढ़ कर उस मोती को सजाना है अपने हार में
पाकर अमृत को सीना है अपने कंठ में
अपना परचम फहराना है समुद्र के गर्भ में
कह दो उन गरजती बिजलियों से कोई
समुद्र के दिल पर अपना नाम लिखना ही हमारा फ़साना है
कह दो किनारों से, हमें बह जाना है
रोके न हमें, हमें कुछ पाना है।

Sunday, 16 August 2009

मुक्तक

१) वो कहते हैं महखानों में महफ़िल सजा करती है,

पैमानों पर ज़िन्दगी बिका करती है,

हर जाम पर हसीं लुटा करती है,

अरे! झांक लेते हमारे दिल में,

उनकी हर प्रेरणा, हर तारीफ के लिए,

इस अवनि के शब्द बहा करते हैं,

विचारों के झरने कल- कल किया करते हैं।


२) कभी उन राहों पर महफ़िल सज़ा करती थी,
हर मंज़र पर लोगों की आहट थी,
हर कोने में पदचाप की आवाज़ थी,
आज वहीं मरघट सा सन्नाटा है,
भारत के हर गांव का यही नज़ारा है,
बंजर धरती, तन्हा बेसहारा है,
बस कुछ बूढी आंखों में उम्मीद का बसेरा है,
जाने कब कुछ बदलेगा,
ये इस कलम का सच्चा सपना है।

ये अश्क जाने क्या कह जाते हैं


ये अश्क जाने क्या कह जाते हैं,
बिन कहे सब कुछ बयां कर जाते हैं,
भीड़ में तन्हा कर जाते हैं,
तन्हाई में सागर से बह जाते हैं,
ये अश्क जाने क्या कह जाते हैं।
आंखों में मोती से सज जाते हैं,
चेहरे पर गम की छाया दिखा जाते हैं,
ज़िन्दगी वीरान, बंजर कर जाते हैं,
अपनों का बेगानापन महसूस करा जाते हैं,
ये अश्क जाने क्या कह जाते हैं।
जब बहते हैं, मन बहा ले जाते हैं,
ज़िन्दगी की उमंग चुरा ले जाते हैं,
नगमों से साज़ जुदा कर जाते हैं,
ज़माने की तल्खी दिखा जाते हैं,
ये अश्क जाने क्या कह जाते हैं।
कभी मन मज़बूत कर जाते हैं,
कभी हर खुशी छीन जाते हैं,
कभी सपने चुरा ले जाते हैं,
कभी एक अजीब सा सुकून दे जाते हैं,
ये अश्क जाने क्या कह जाते हैं।

कश्मकश


हर शब्द को ज़ुबां नहीं होती,
मन के दर्पण की हर तस्वीर हसीं नहीं होती,
तनहा, खामोश जी लेते हम,
गर कुछ पाने की चाहत नहीं होती।

यों ही नहीं, हम खफा जुदा से हैं,
दिल में हर बात छुपाये से हैं,
कह पाते तो बता देते किसी को,
मगर कोई ऐसा दिल के करीब नहीं हैं।
किताब का हर पन्ना खुला है,
फिर भी हर शब्द अनपढ़ा सा है,
लिख देते ज़िन्दगी की हर कहानी,
मगर कोई सच्चा श्रोता मिला नहीं है।
मन में कई चाहतें, ख्वाहिशें हैं,
पर हर चाहत को मंजिल नहीं हैं,
यों तो मन को समझा देते हम,
जाने क्यों मुझे समझने वाला कोई मिला नहीं है।
इन कुछ सवालों का जवाब नहीं है,
ज़िन्दगी की इस कश्मकश का कोई अंत नहीं है