Thursday, 27 June 2013

मैं आज़ाद थी, आज़ाद हूँ?

बंधनों से जकड़ी हूँ,
समाज के दायरे में फंसी हूँ,
रीती-रिवाजों की  कठपुतली हूँ,
परिवार के झूठे सम्मान की कड़ी हूँ,
हर फैसले के लिए औरों को तकती हूँ,
वो कहतें हैं, फिर भी गर्व से,
मैं आज़ाद थी, आज़ाद हूँ।

अपनी हर हार मंगलसूत्र में छिपाए,
पायल की झंकार से अपनी सीमा बनाए,
आभूषणों से सजी एक बंधक हूँ,
अपनी शादी का बस एक स्टाम्प हूँ,
पति के नाम, साये में कहीं गुम हूँ,
वो कहतें हैं, फिर भी गर्व से,
मैं आज़ाद थी, आज़ाद हूँ।

पहले पिता के संस्कारों की प्रदर्शनी थी,
इसलिए मायके में कभी हंस न सकी,
बाद में आदर्श बहु, पत्नी की छवि में कैद थी,
इसलिए खुलकर कभी जी न सकी,
बूढी हुई, तब कमज़ोर थी,
इसलिए ये कभी कह न सकी,
उनकी आज़ादी की परिभाषा,
कभी भी समझ न सकी।

वो कहते रहे- मैं आज़ाद हूँ,
वो सपना बुनते रहे- मैं आज़ाद हूँ,
वो खुद की दिलासा देते रहे,
मैं आज़ाद थी, आज़ाद हूँ,
वो सच से भागते रहे,
मैं आजद थी, आज़ाद हूँ,
वो कहते रहे गर्व से,
मैं आज़ाद थी, आज़ाद हूँ।

जीने दिया उनको मैंने ये सोचकर,
क्या कर लेंगे, वो सच जानकर,
हमेशा खामोश थी, उनकी इस बात पर,
'आज़ाद हूँ मैं, ज़िन्दगी के हर मोड़ पर,
हाँ, आज इस दो गज़ ज़मीन के नीचे,
कहती हूँ सच आखिरी सांस लेकर,
मैं पराधीन थी, पराधीन हूँ, पराधीन रहूंगी,
जब तक तुम्हारी, झूठी कल्पना में कैद रहूँगी।।

Friday, 22 February 2013

कुछ लिखा है...

कुछ किया है,
बहुत करना बाकी है।
कुछ ज़ाहिर किया है,
बहुत कहना बाकी है।  
कुछ लिखा है...
पर गहराईओं को छुना बाकी है।

कुछ सोचा है,
बहुत संजोना बाकी है। 
कुछ देखा है,  
बहुत महसूस करना बाकी है।  
कुछ लिखा है...
पर अक्षरों को ढूंढना बाकी है।

कोई राग छेड़ा है,
पर सुरों को समझना बाकी है।
बहुत सच को सुना है,
पर उसे जीना  बाकी है।
कुछ लिखा है...
पर शब्दों  सजाना बाकी है।

प्यार किया है बहुत,
पर जाताना बाकी है।
प्रेम-पत्र लिखे हैं बहुत,
पर प्रेम का मतलब समझना बाकी है।
कुछ लिखा है...
पर जज़बातों को समझना बाकी  है।

सजदा किया है बहुत,
पर संजीदा होना बाकी है।
ख्वाब देखे हैं बहुत,
पर हकीकत बनाना बाकी है।
कुछ लिखा है...
पर पंक्तियों का तालमेल बाकी है।

बहुत कम किया है,
बहुत करना बाकी है।
बनना है कलमकार,
पर कलम पकड़ना बाकी है।
कुछ लिखा है...
पर भाषा का ज्ञान बाकी है।
ये तो बस शुरुआत है,
अभी आसमान छुना बाकी है।
अर्श पर अपना नाम लिखना बाकी है।


Tuesday, 4 December 2012

एक गुस्ताखी

मौसमों की एक गुस्ताखी है,
बेपरवाह बूंदों की मज़बूरी है,
ठंडी  नब्ज़ों की परेशान करवटें हैं,
जलती तमन्नाओं की राख है,
बेजान पतझड़ों का ये बीहड़ है।

परछाइयों से कांपती पदचाप है,
अधीर मन की टूटन-फूटन है,
अधकच्चे सपनों की बिखरन है,
अनकहे शब्दों का कालुष है,
क्षण में जीवन की ये करवट है।

कल्पना की कोशिश निष्क्रिय है,
कलम की स्याही भी सूखी है,
दशा औ दिशा अब कमज़ोर है,
मौसम हर अब खामोश है,
नैनों में तिमिर की बस आहट है।
नैनो में तिमिर की बस आहट है।

मौसमों का रवैय्या कुछ रूठा है,
नदी का बहाव ज़रा ठहरा है,
लिए हाथ में पतवार फिर भी,
मंजिल के तरफ एक कदम लिया है,
खुद को ढूँढने का साहस किया है।
मन की आँखों को जाग्रत किया है।

Sunday, 27 February 2011

कभी सोचा न था

कभी सोचा न था
इतने बदल जायेंगे
देख कर दुःख दुनिया का
मन ही मन मुस्कुराएंगे
लिखे न जो शब्द कभी
आसानी से कह जायेंगे
कभी सोचा न था
कह कर भी सब यूँ खामोश हो जायेंगे।
स्व- समझदारी के भ्रम में
दुनिया से छले जायेंगे
लोगों में पहचाने जाने की होड़ में
अपनी ही नज़रों में खो जायेंगे
दोस्तों की चाह में
बेगानों का समां पाएंगे
कभी सोचा न था अपनी मासूमियत भूल जायेंगे
चंद महीनों में इतने बदल जायेंगे।
हंसी- ठ्ठे की राहों में
गम के रोड़े हज़ार मिल जायेंगे
छोटे शहर की इस लड़की को
असहजता के इतने बहाने मिल जायेंगे
ख़ामोशी को कमजोरी समझने वाले
अनेकों नासमझ महाशय मिल जायेंगे
कभी सोचा न था
जीवन की दौड़ में पिछड़ जायेंगे।
न इल्म था कभी
इन परिस्थियों में भी जी जायेंगे
अपनी तन्हाई में हीरे मिल जायेंगे
लोगों की दुनिया से परे
शब्दों की मायानगरी में खो जायेंगे
सही- गलत के द्वंद्व से छूटकर
आत्मविश्वास की ओर बढ़ जायेंगे
आँधियों से लड़ना सिख जायेंगे।
दुनिया से लड़ते- लड़ते
खुद को बखूबी समझ जायेंगे
छोड़ कर हर ठोंग- दिखावे को
अपनी अंतरात्मा के परखी बन जायेंगे
खुद ही अपना पारस बन जायेंगे
दुनियादारी सीख जायेंगे
कभी सोचा न था
इतने बदल जायेंगे।
सही मायनों में जीना सीख जायेंगे
निराशाओं में आशा के नए पल्लव खिल जायेंगे
भावों के वेग में बह कर भी संभल जायेंगे
कभी सोचा न था
इतने बदल जायेंगे।

Wednesday, 3 November 2010

एक दीप मेरा हो

दीपों की इस अवली में एक दीप मेरा हो

साँसों की लड़ियों में एक ज्वाल कैद हो

अंधकार से लड़ती एक अंतर्जोत हो

ठहरा सा हर पल मेरा दैदीप्यमान हो

हौसलों की पंक्ति में बस एक मुकाम मेरा हो।

बंदिशों की लड़ियाँ टूट कर बिखर पड़ें

ख़ामोशी की कड़ियाँ उफान बन बरस पड़ें

आत्मविश्वास के आगे सारे झूठ टूट पड़ें

कुछ ऐसी अखंड उस दीप की जोत हो

दीपों की इस अवली में एक दीप मेरा हो।

दिलों की कड़वाहट में मिठास भर सकूं

ऐसा उस दीप में मेरे प्यार का तेज़ हो

अधकच्चे रिश्तों में एक पक्का धागा मेरा हो

उमंगों की रोशनी में बस एक अमर जोत हो

दीपों की इस अवली में एक दीप मेरा हो।

मेरे भावनाओं के समंदर में इतना वेग हो

अंधकार के बीच भी मंजिल का प्रकाश हो

नयी सुबह का कुछ यूँ अलबेला अंदाज़ हो

दीपों की इस अवली में एक दीप मेरा हो

हौंसलों की पंक्ति में बस एक मुकाम मेरा हो।

Wednesday, 25 August 2010

चाहतें

ज़िन्दगी गर रेत का ढेला है,
तो उसे मुट्ठी में भरना चाहते हैं हम।
न हुए कामयाब तो क्या,
एक कोशिश फिर भी करना चाहते हैं हम।।
पतंग बन खुले आसमान में उड़ना चाहते हैं हम,
उमंगों के दम पर नए आयाम लिखना चाहते हैं हम।
कट जाने पर भी मुस्कुराना चाहते हैं हम,
टूट कर फिर से नयी उड़ान भरना चाहते हैं हम॥
दरिया में मदमस्त नाव बन मौज करना चाहते हैं हम,
बिना थमे सुध-बुध खोकर बहना चाहते हैं हम
डूब गए तो फिर से तर जाना चाहते हैं हम,
बस निरंतर मुश्किलों से लड़े प्रवाहित होना चाहते हैं हम।।
अगर रह गए कुछ पल अकेले तो,
तेरी बातों के आलिंगन में खोना चाहते हैं हम।
ज़िन्दगी गर एक लम्बा सफ़र है,
तो हमसफ़र तेरा साथ चाहते हैं हम।।
इन चाहतों के समंदर में गोते लगाना चाहते हैं हम,
बस अपने मन की आवाज़ सुनना चाहते हैं हम।
दुनिया नहीं, बस कुछ दिल जीतना चाहते हैं हम
कामयाबी के शिखरों पर अपना नाम लिखना चाहते हैं हम।।

Wednesday, 18 August 2010

ये कैसा मौत का तमाशा है

ये कैसा मौत का तमाशा है
पागलपन में डूबा जग सारा है
ढोंग करता मनु, हर हथियारा है
ये कैसा मौत का तमाशा है।
किसी की मौत यहाँ सुनहरा मौका है
अपना मतलब सिद्ध करने का पुलिया है
गुस्से को जाहिर करने का गलियारा है
ये कैसा मौत का तमाशा है।
ये कैसी खोखली श्रधांजलि है
आँखें है नम पर मन में मतलब की आग है
मौत के नाम पर खोखला अधिकार जगा है
ये कैसा मौत का तमाशा है।
मिडिया की होड़ में सच लगा है
दंगे में उसकी मौत का बदला छुपा है
कहो तो, सच्चाई के लिए, ये झगडा है
ये कैसा मौत का तमाशा है।
दुनिया का कैसा ये मृत्यु महोत्सव है
सच्चाई के नाम पर ढोंग का तांडव है
पागलपन में डूबा जग सारा है
ये कैसा मौत का तमाशा है।

Saturday, 14 August 2010

ये कैसा दुहरापन है ज़िन्दगी तेरा, दोगलेपन में डूबा है हर इंसान तेरा

ऊब गया है अब मन मेरा

रो उठा है हर मंज़र मेरा

कांप रहा है हर सच मेरा

ये कैसा दुहरापन है ज़िन्दगी तेरा,

दोगलेपन में डूबा है हर इन्सान तेरा।

राम की माला में रावण का मोती सिया

मंदिर की दीवारों को खून से रंगा गया

रहीम की अहिंसा में हिंसा को खोज लिया

निर्बल को कुचलने में सुकून हासिल कर लिया

ये कैसा दुहरापन है ज़िन्दगी तेरा,

दोगलेपन में डूबा है हर इंसान तेरा।

मन में देवता, आचरण में राक्षस, हर मनु यहाँ

धर्म का नगाड़ा पीटता हर ढोंगी यहाँ

खोखले सिधान्तों को रटता हर कमज़ोर यहाँ

वसुधैव- कुटुम्बकम को छेदता हर जात- पात यहाँ

ये कैसा दुहरापन है ज़िन्दगी तेरा,

दोगलेपन में डूबा है हर इंसान तेरा।

अपने ही खून को जूठे मान में बहा दिया

आज़ादी की नासमझी में बेटी को जल्दी ब्याह दिया

आवाज़ उठाने पर औरत को कुलक्षनी बना दिया

बेटे की अय्याशियों पर नादानी का पर्दा डाल दिया

ये कैसा दुहरापन है ज़िन्दगी तेरा,

दोगलेपन में डूबा है हर इंसान तेरा।

इज्ज़त की चादर में अपनों की इच्छाओं को ढक दिया

समाज के साए में कई अरमानों को जला दिया

संस्कारों की नाव में कई इंसानों को डुबो दिया

सच्चाई के डर से अपना ईमान बेच दिया

ये कैसा दुहरापन है ज़िन्दगी तेरा,

दोगलेपन में डूबा है हर इंसान तेरा।

चीख रहा है अब मन मेरा

व्याकुल है हर क्षण मेरा

मेरी आवाज़ दबाने को आतुर है जग तेरा

ये कैसा दुहरापन है ज़िन्दगी तेरा,

दोगलेपन में डूबा है हर इंसान तेरा।

Friday, 13 August 2010

मैं कौन हूँ? मेरी पहचान क्या है?

कटी पतंग सा मेरा हर फ़साना क्यों है?
अधमरे सपनों का यहाँ बसेरा क्यों है?
हर दिशा में पसरा वीराना क्यों है?
बिखरा मेरी ज़िन्दगी का हर पल क्यों है?
मैं कौन हूँ? मेरी पहचान क्या है?
दो पाटों के बीच ज़िन्दगी उलझी क्यों है?
अपनों के बीच ये दरारें क्यों है?
हमसफ़र और सहचर की ये दुविधा क्यों है?
निराशा के समंदर में गुम हौसला कहाँ है?
मैं कौन हूँ? मेरी पहचान क्या है?
खुद को ढूढने की कोशिश अधूरी क्यों है?
खुद को कम आंकने की आदत क्यों हैं?
शब्दों की दुनिया में ये खालीपन क्यों है?
सोच की गहराई में ये खोखले सिद्धांत क्यों है?
मैं कौन हूँ? मेरी पहचान क्या है?
मेरे सवालों का जवाब क्या है?
इस अंतर्द्वंद्व का अंत क्या है?
इस कलम की सोच क्या है?
इस अवनि की मंजिल क्या है?
मैं कौन हूँ? मेरी पहचान क्या है?

Wednesday, 28 April 2010

कह दो किनारों से, हमें बह जाना है

कह दो किनारों से, हमें बह जाना है
रोके न हमें, हमें कुछ पाना है
तो क्या हुआ मंजिल ज़रा दूर है
अकेली नाव में एक ही पतवार है
कह दो उन उफानी लहरों से कोई
साहस ही हमारा तराना है
कह दो किनारों से, हमें बह जाना है।
है क्या किसी में इतना दम
रोक ले जो हमारे कदम
डाल दे रोड़े राहों में कोई हज़ार
झुकेगा न एक पल भी इस नाव का कहार
कर दो आगाह उन समुद्री दरिंदो को कोई
आत्मविश्वास से ही ये जग हारा है
कह दो किनारों से, हमें बह जाना है।

चाहे रोक ले इस ज़िन्दगी की सांस कोई
रोक पायेगा न इस सोच की रफ़्तार कोई
कैद कर ले मेरा हर पल कोई
न छु सकेगा मेरे स्वाभिमान को कोई
कह दो उन भयानक समुद्री राहों से कोई
इस कलम को बैखौफ बहते जाना है
कह दो किनारों से, हमें बह जाना है।

ढूंढ़ कर उस मोती को सजाना है अपने हार में
पाकर अमृत को सीना है अपने कंठ में
अपना परचम फहराना है समुद्र के गर्भ में
कह दो उन गरजती बिजलियों से कोई
समुद्र के दिल पर अपना नाम लिखना ही हमारा फ़साना है
कह दो किनारों से, हमें बह जाना है
रोके न हमें, हमें कुछ पाना है।

Sunday, 16 August 2009

मुक्तक

१) वो कहते हैं महखानों में महफ़िल सजा करती है,

पैमानों पर ज़िन्दगी बिका करती है,

हर जाम पर हसीं लुटा करती है,

अरे! झांक लेते हमारे दिल में,

उनकी हर प्रेरणा, हर तारीफ के लिए,

इस अवनि के शब्द बहा करते हैं,

विचारों के झरने कल- कल किया करते हैं।


२) कभी उन राहों पर महफ़िल सज़ा करती थी,
हर मंज़र पर लोगों की आहट थी,
हर कोने में पदचाप की आवाज़ थी,
आज वहीं मरघट सा सन्नाटा है,
भारत के हर गांव का यही नज़ारा है,
बंजर धरती, तन्हा बेसहारा है,
बस कुछ बूढी आंखों में उम्मीद का बसेरा है,
जाने कब कुछ बदलेगा,
ये इस कलम का सच्चा सपना है।

ये अश्क जाने क्या कह जाते हैं


ये अश्क जाने क्या कह जाते हैं,
बिन कहे सब कुछ बयां कर जाते हैं,
भीड़ में तन्हा कर जाते हैं,
तन्हाई में सागर से बह जाते हैं,
ये अश्क जाने क्या कह जाते हैं।
आंखों में मोती से सज जाते हैं,
चेहरे पर गम की छाया दिखा जाते हैं,
ज़िन्दगी वीरान, बंजर कर जाते हैं,
अपनों का बेगानापन महसूस करा जाते हैं,
ये अश्क जाने क्या कह जाते हैं।
जब बहते हैं, मन बहा ले जाते हैं,
ज़िन्दगी की उमंग चुरा ले जाते हैं,
नगमों से साज़ जुदा कर जाते हैं,
ज़माने की तल्खी दिखा जाते हैं,
ये अश्क जाने क्या कह जाते हैं।
कभी मन मज़बूत कर जाते हैं,
कभी हर खुशी छीन जाते हैं,
कभी सपने चुरा ले जाते हैं,
कभी एक अजीब सा सुकून दे जाते हैं,
ये अश्क जाने क्या कह जाते हैं।

कश्मकश


हर शब्द को ज़ुबां नहीं होती,
मन के दर्पण की हर तस्वीर हसीं नहीं होती,
तनहा, खामोश जी लेते हम,
गर कुछ पाने की चाहत नहीं होती।

यों ही नहीं, हम खफा जुदा से हैं,
दिल में हर बात छुपाये से हैं,
कह पाते तो बता देते किसी को,
मगर कोई ऐसा दिल के करीब नहीं हैं।
किताब का हर पन्ना खुला है,
फिर भी हर शब्द अनपढ़ा सा है,
लिख देते ज़िन्दगी की हर कहानी,
मगर कोई सच्चा श्रोता मिला नहीं है।
मन में कई चाहतें, ख्वाहिशें हैं,
पर हर चाहत को मंजिल नहीं हैं,
यों तो मन को समझा देते हम,
जाने क्यों मुझे समझने वाला कोई मिला नहीं है।
इन कुछ सवालों का जवाब नहीं है,
ज़िन्दगी की इस कश्मकश का कोई अंत नहीं है

Monday, 16 March 2009

मैं कहाँ लिखती हूँ

मैं कहाँ लिखती हूँ

बस दिल की दो बातें कहती हूँ

मन के दर्पण की तस्वीर बनती हूँ

अपनी कलम की कहानी कहती हूँ

नज़रों के नज़रों को बयां करती हूँ

ज़माने के सच को बताती हूँ,

दिल के अरमान बताती हूँ

मैं कहाँ लिखती हूँ

बस दिल की दो बातें कहती हूँ।

अपने जज्बातों को ज़ुबान देती हूँ

कुछ खट्टे मीठे पलों को संजोती हूँ

ज़िन्दगी के लम्हों को शब्दों मैं कैद करती हूँ

सागर की लहरों पर काव्य लिखा करती हूँ

आसमान की चादर पर अरमानों को लिखा करती हूँ

ज़मीन की हकीकत पर सच्चाई बुना करती हूँ

बस यूँ ही एक नगमा लिखा करती हूँ

मैं कहाँ लिखती हूँ

बस दिल की दो बातें कहती हूँ।

नहीं मैं कोई लेखक नहीं

कोई कवि, कोई महान् नहीं

बस एक कलमकार हूँ

शब्दों के समंदर मैं डूबी हूँ

कुछ नही है मेरा, इन शब्दों के अलावा

इन भावनाओं, जज्बातों के अलावा

बस शब्दों से खेला करती हूँ

मैं कहाँ लिखती हूँ

बस दिल की दो बातें कहती हूँ।

सूना आँगन, सूना गलियारा है

सूना आँगन, सूना गलियारा है

सूना पनघट, सूना हर किनारा है

कभी खेलती थी ज़िन्दगी यहाँ पर

कभी साँस लेती थी खुशी यहाँ पर

आज बस बंजर हर नज़ारा है

वीरानियों का पसरा तमाशा है।

कभी यहाँ होती थी अठखेलियाँ

कभी यहाँ नाचती थी कठपुतलियां

कभी यहाँ मदमस्त हो नाचते थे मोर

कभी यहाँ होता था बच्चों का शोर

आज सूखे पेड़ों का राज है

सूना आँगन, सूना गलियारा है।

काँटों भारी पगडंडी के छोर पर

दूर एक झोंपड़ी के दरवाज़े पर

दो बूढ़ी आँखों का बसेरा है

निराशा में डूबी एक आशा का गुज़ारा है

ज़िन्दगी एक अजब तमाशा है,

सूना आँगन, सूना गलियारा है।

बेहाल भारत का हर गाँव है

अवनति की ओर बढ़ता इंसान है

भूल गया है अपनी पहचान को

बस शहरों में दिल लगा कर बैठा है

गैरों में अपनों को तलाशने पर आमादा है।

जिस गाँव में जीवन बिताया

जिस मिट्टी ने जीना सिखाया

जिस पनघट ने अमृत पिलाया

जिस वृक्ष ने फल खिलाया

आज वहीं वीरानगी, अंधेरा है

सूना आँगन, सूना गलियारा है।

सब कहते हैं- हम आज में जीते हैं

पर क्या हम कल को भुला सकते हैं

हमारी संस्कृति को भूल सकते हैं

अपनी धरोहर को मिटा सकते हैं

शायद कभी तो कोई ये समझेगा

फिर शायद सूना आँगन, सूना गलियारा 'न ' रहेगा।

जाने क्यों दिल में एक ख्वाहिश जगी सी है

जाने क्यों दिल में एक ख्वाहिश जगी सी है,
एक हूक, एक कसक उठी सी है,
कुछ पाने की तमन्ना दिल में मचली सी है,
कुछ तराना गुनगुनाने की ललक उठी सी है,
जाने क्यों दिल में एक ख्वाहिश जगी सी है।
लोग कहते हैं- हर सपने को मंज़िल नहीं है,
हर इबादत में, हर दुआ में भगवान नही है,
ज़िंदगी में राहें तन्हा, डगर आसान नही है,
हर लहर को किनारा, सहारा नहीं है,
जाने क्यों फिर भी दिल में एक ख्वाहिश जगी सी है,
सीपों से मोती चुराने की चाहत मचली सी है।
ज़माने के लिए नहीं खुद के लिए जिया करना,
किनारों के लिए, सपनो के लिए लड़ा करना,
तूफान भी टल जाएगा,
मज़िल भी मिल जाएगी,
बस खुद पर यकीन रखना,
मौसमों के आगे ना झुका करना,
क्योंकि मौसम में छुपा एक मीठा एहसास है,
अंत के बाद ही एक मीठी शुरुआत है,
आज ना जाने उस शुरुआत के लिए मन मचला सा है,
एक सपना दिल में जगा सा है।
जाने क्यों एक मंज़िल की तलाश जगी सी है,
जाने क्यों दिल में एक ख्वाहिश जगी सी है।

Saturday, 29 November 2008

एक जंग- आतंकवाद के संग

मैं एक मुम्बईकर हूँ। शायद ये बात ही मेरे दिल के दर्द को बयां कर दे। पर नहीं मुझे आज दिल का दर्द नहीं बयां करना। आज मुझे एक हकीक़त को लिखना है।

जो मुंबई शहर सोता नहीं था, आज वहाँ शाम के सात बजे भी मरघट जैसा सन्नाटा था। शायद हर दिल में एक भय था, एक डर था। जो शहर आज तक नहीं थमा था, वो आज थम गया था। जिसकी वजह थी- आतंकवाद।

आतंकवाद बहुत बड़ा शब्द है। जिसे मैंने किताबों में पढ़ा, जिस शब्द को बड़ी सहजता से मैंने अपनी कविताओं में, लेखों में लिखा था, जिसे मैंने टीवी पर जयपुर, दिल्ली, बंगलोर, अहमदाबाद में ब्लास्ट के दौरान देखा था, जिसे मैंने बुरा तो माना था लेकिन जिसे मैंने एक आम, रोज़मर्रा की बात मानकर भुला दिया था, जिस शब्द को मैंने दुनिया में एक आम नज़ारा मानकर, भारत की किस्मत मानकर भुला दिया था। लेकिन आज जब अपने घर को जलते देखा, अपने शहर को छटपटाते हुए देखा, अपने घर के कुछ दूर पर लोगो को मरते हुए देखा तो अहसास हुआ ये आतंकवाद शब्द का मतलब क्या है, इस छोटे शब्द के परिणाम क्या है, जलते जयपुर, दिल्ली, बंगलोर, अहमदाबाद का दर्द क्या है, अफगानिस्तान, इरान के हालात क्या है, डब्लू.टी.ओ. की कहानी क्या है।

शायद आज अहसास हुआ की मरने का भय क्या होता है, हर आती- जाती साँस पर खुद का पहरा नहीं किसी और की बंदिश कैसी होती है, रात को आँख बंद करने से पहले ये सोचना कि ' कल हो ना हो' कैसा होता है, थोड़ी सी आहट पर डरना क्या होता है, ख़ौफ़ के साए में जीना कैसा होता है। शायद ताज के हर जलते कोने में मेरी जीवन की उमंग कहीं खो गई है।

आज आसमान की खामोशी भी दिल को दहला रही थी, रात का अन्धेरा सुबह के उजालों पर हावी हो रहा था, आकाश में हर उड़ता परिंदा शायद मेरे दर्द को महसूस कर रहा था और बिना शोर किए बस अनमने मन से निरंतर उड़ रहा था।

यकीन नहीं होता कि जिस ताज में कुछ दिनों पहले मैने अपना वक्त गुज़ारा था, जहाँ जाकर मैंने खुद को बहुत खुश पाया था, आज वही जगह मेरे लिए बस एक टूटी हुई दहशत से भरी इमारत थी। शायद वक्त बदल गया है या यों कहें की गोलियों की आवाज़ ने, बॉम्ब ब्लास्ट की आवाज़ ने, मरघट से सन्नाटे ने, चलते-फिरते शहर में सेना की छावनी ने सब कुछ बदल दिया।

इन सब के बीच सिर्फ़ एक बात ने मेरा हौसला बनाए रखा और जीने की तमन्ना को बनाए रखा, वो थे हमारे आर्मी, एन. एस. जी., ए. टी. एस, नेवी, एयरफोर्से के जाँबाज़ जिन्होंने अपने देश की रक्षा के लिए, हमारे जैसे लोगों की साँसे चलती रहे इसलिए खुद की जान गवाँ दी।

जो कुछ हुआ आम आदमी को हुआ, इन नेताओं का कुछ नहीं बिगड़ा। इन लोगों ने तो इस परिस्थिति का इस्तेमाल भी अपने वोट- बैंक बढ़ाने में कर लिया। कहाँ गये वो मुंबई का नारे लगाने वाले नेता जो आज अपने घर में दुबके हुए हैं। उन्हें कुछ नहीं होगा, बस हमारे ये जाँबांज़ नौजवान और आम लोग ही मरेंगे। खैर ये वक्त किसी पर इल्ज़ाम लगाने का नहीं है। क्योंकि हम भी कुछ कम ग़लत नहीं है, क्योंकि हमें हर चीज़ की आदत बड़ी जल्दी हो जाती है, कुछ दिनों में इस हादसे के साथ जीने की भी हमें आदत हो जाएगी। पता नहीं कब हमें कुछ बदलने की आदत कब होगी।

लेकिन चाहे जो हो, हमारे देश के सिपाही तो हमारे अपने हैं। ये सोच कर भी मन भर उठता है, दिल रो उठता है कि कुछ लोगों ने इसलिए अपनी आँखे बंद कर ली ताकि हमारी साँसे चलती रहें। आज पहली बार इन आँखों से अश्रु बहे उन लोगों के लिए जो भले ही मेरे पहचान के ना हो लेकिन जिनका दर्जा मेरे जीवन में बहुत ऊँचा है। ऐसे इन जाँबाज़ों को मेरा शत- शत नमन।

इस घटना ने मुझे पूरी तरह से बदल दिया है। मेरी सोच को झकझोर दिया है। एक आम, मदमस्त रहने वाली इस लड़की को, उसके निश्छल, चंचल मन को गहरी सोच में डाल दिया है। मुझे उम्र भर शायद मुंबई के बारे में कुछ याद रहे ना रहे लेकिन ये घटना मेरे हृदय पटल पर मरते दम तक एक बुरी याद के रूप में अंकित रहेगी। जिसे चाह कर भी मैं मिटा नहीं पाऊँगी।

शायद इन तीन दिनों के बाद मेरी ज़िंदगी के प्रति सोच वैसी के वैसी ना रहे और बदल जाए, पर एक बात तो ज़रूर रहेगी की ज़िंदगी इतनी आसान नहीं है, हर पल एक जंग है और इस बार ये जंग थी आतंकवाद के साथ, कल शायद ये जंग ख़त्म हो आतंकवाद को मिटाने के साथ।

Wednesday, 4 June 2008

हमारी पहचान?

क्या सिर्फ़ शहर ही हमारी पहचान है? मुम्बई, दिल्ली, बंगलौर आदि महानगर ही हमारी पहचान है ? गांव हमारे नहीं हैं? क्यों एक मुम्बई में रहने वाला इंसान भारत के सभी शहरों को गाँव कहता है और उसे पिछडा हुआ मानता है? इन सब सवालों के जवाब मुझे आज तक नहीं मिले?


आज लोगों को क्या हो गया है। वे अपनी जड़ों से इतना दूर क्यों होते जा रहे है। आज इंसान यह भूल जाता है की कहीं न कहीं वह भी भारत के किसी गाँव से जुड़ा ही होता है। भले ही आज वह शहरों में रह रहा हो लेकिन पिछली पीढ़ियाँ तो गाँवों में ही रही होंगी। क्यों आज इंसान अपने गाँव, अपनी जन्मभूमि , अपनी पहचान से कतरा रहा है, उसे हीन दृष्टि से देख रहा है। आज हम ख़ुद को गाँव का बताने में भी बहुत लज्जित महसूस करते हैं। हमें लगता है की कहीं सामने वाला व्यक्ति हमें बेवकूफ न समझ ले। पर इन सब बातों के बारे में सोचते हुए हम यह भूल जाते हैं की हमारी असली पहचान, हमारी धरोहर, हमारी संस्कृति, भारत की पहचान हमारे गाँव है। अतः वे न केवल सम्मानजनक स्थल है अपितु हमारे जीवन का एक अभूतपूर्व अंग हैं।


कौन कहता है हमारे गाँव पिछडे हुए हैं! जब दुनिया न्याय का मतलब भी नहीं जानती थी तब हमारे गाँवों में पंचायत हुआ करती थी। जब स्कूल नहीं हुआ करते थे तब दादा, नाना गाँव के चबूतरे पर बैठकर अपने पोते- पोतियों को देश- विदेश की कहानियाँ सुनाया करते थे। इतना ही नहीं दुनिया में हर सफलता की कुंजी ' एकता' का पाठ भी हमारे गाँवों में नायाब तरीके से पढाया जाता था। जब गाँव भर के लोग एक साथ मिलकर दूरदर्शन देखते थे तब वे दूरदर्शन का आन्नद तो लेते ही थे साथ ही एक- दुसरे के साथ का भी अन्नंद लेते थे। गाँव की पाठशाला में जो सीख बच्चों को दी जाती थी, वो शिक्षा भी आज का कोई स्कूल या विद्यालय अपने बच्चों को नही दे सकता। जो प्रेम, सौहाद्र, सुख, शान्ति का पाठ उन स्कूलों में पढ़ाया जाता था, वो बात आज के स्कूलों में कहां है! हर धर्म, हर व्यक्ति के प्रति सम्मान, मुसीबत में एक दुसरे का साथ देने की तत्परता आज कहां देखने को मिलती है। कम से कम इन शहरों में तो देखने को नहीं मिलती है। इन सब बातों को देखकर भी अगर हम यह सोचते और कहते हैं की हमारे गाँव पिछडे हुए हैं तो शायद मेरे नज़रिये में हमारी सोच पिछड़ी हुई है।


हाँ ये ठीक है की अब वक्त बदल गया, टेक्नोलॉजी ने भी प्रगति की है परन्तु इसका मतलब यह नहीं की हम आज में जीने के लिए कल को भुला दें; अपनी धरोहर, अपनी संस्कृति को भुला दें। कल तक हमे जिस गाँव की ज़रूरत थी, आज उसी गाँव को हमारी ज़रूरत है। अगर हम उस गाँव की ज़रूरत नहीं पूरी कर सकते तो कम से कम उसका अपमान न करे और न ही उसे हीन दृष्टि से देखें।

Saturday, 17 May 2008

ये कैसे स्वतंत्र हम

सब कहते हैं स्वतंत्र हम

आजाद बन्धन मुक्त हम

हाँ, अंग्रेजों को भगा दिया

हाँ, माँ को बन्धन मुक्त किया

लाखों वीरों को होम किया

हाँ, खुली हवा में साँस (दम) लिया

पर हाय! इतने सालों में

आज़ादी का क्या हश्र किया

हर स्वतंत्रता दिवस पर

पूछूँ मैं सबसे, कहां आजाद हम

पर के नहीं स्व के अधीन हम

अंग्रेजों के नहीं, अंग्रेजों के नहीं

स्वार्थ के अधीन हम

फिर भी कहते स्वतंत्र हम।

औरों के गुलाम नहीं तो क्या

स्पष्ट अधीन नहीं तो क्या

पाश्चात्य संस्कृति के गुलाम हम

स्वदेशी नहीं विदेशी ब्रांड के गुलाम हम

छाछ नहीं पेप्सी कोक के आदी हम

पिज्जा मेकडोनाल्ड के आदी हम

खान -पान तक विदेशी चाहत

फिर भी कहते स्वतंत्र हम ।

स्विस बैंकों में खाता खुलवाते

पढ़ते यहाँ पलायन करते

ज्ञान को अपने वहाँ खपाते

नीम- चांवल को बचा न पाये

अंतर्राष्ट्रीय कर्जे में डूबे आर्धिक रूप से विकलांग हम

फिर भी कहते स्वतंत्र हम।

ये सब रही विदेशी बातें

पर घर में भी हम नहीं स्वतंत्र

बुराई, भ्रष्टाचार दिल में बसाए

आतंकवाद को गले लगाये

वैर- वैमनस्य में गोते खाए

जाती धर्म पंथ विवाद बढाये

खोखले सिधान्तों में जकडे हम

बुराई के फंदे में गुंथे हम

फिर भी कहते स्वतंत्र हम।

पर ऐसा नहीं की हममें जोश नहीं

कुछ कर गुजरने का होश नहीं

पर ज़रूरत है नए आगाज़ की

एक नयी आवाज़ की

चूँकि बिन जागृति आजादी न पा सकेंगे हम

तभी होंगे सही अर्थों में स्वतंत्र हम।

हम कायर नहीं हैं

जयपुर में विस्फोट हुआ
चीन में भूकंप आया
म्यांमार में तूफ़ान आया
भारत में आतंकवाद का साया
हमने सब आंखों से देखा
देखा और बस भुला दिया
बन्धु हम कायर नहीं हैं
लेकिन हममें सब से लड़ने की क्षमता नहीं है।


अपनी माँ- बहन का अपमान सहा
देश का, कौम का विद्रोह सहा
अपनों के हाथों नीलाम रहा
गैरों से घर आबाद रहा
यह सब कुछ होने पर भी कुछ न कहा
दो आंसू बहाकर चल दिया
जो भी हो हम कायर नहीं है
शायद इस दुनिया को हमारी ज़रूरत नहीं है।



हम कायर हरगिज़ नहीं हैं

अपनी नज़रों में बिल्कुल नहीं है

हम बस ज़माने से हारे हैं

सिर्फ़ एक कलम के सहारे हैं
कलम को भी आजकल कौन पूछता है
कोने मैं बैठा अपनी तन्हाई में जीता है
जो भी हो हम कायर नहीं हैं
पर शायद एक निरीह शायर से कम भी नहीं है।